अलविदा निरवैर! 220 फुट गहरे अंधेरे में ही खो गई मां के लाडले की किलकारी

अंबाला
लाखों दुआएं बेअसर साबित हुईं, और आख़िरकार वही हुआ जिसका डर हर संवेदनशील दिल को था। पिछले कई घंटों से मौत और जिंदगी के बीच कशमकश लड़ रहा मासूम निरवैर जिंदगी की जंग हार गया। रात के सन्नाटे को चीरती हुई जब घड़ी की सुइयों ने 3:25 बजे का इशारा किया, तो 220 फुट गहरे उस अंधेरे बोरवेल से निरवैर को बाहर तो निकाला गया, लेकिन तब तक उसकी सांसों की डोर टूट चुकी थी..
रेस्क्यू टीम जब उसके नन्हे और बेजान शरीर को लेकर बाहर आई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
सिसकियों में बदला उम्मीदों का सैलाब
जैसे-जैसे समय बीत रहा था, लोगों की सांसें अटकी हुई थीं। टनल के भीतर एनडीआरएफ, सेना और स्थानीय प्रशासन के जांबाज एक-एक इंच मलबा हटाकर निरवैर तक पहुंचने की जद्दोजहद में जुटे थे। बाहर खड़ा हर शख्स, मां की सिसकियां और पिता की पथराई आंखें बस एक ही चमत्कार की उम्मीद कर रही थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अंधेरे कुएं में ही थम गईं मासूम की किलकारियां
तड़के 3:25 पर जैसे ही रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हुआ, माहौल में एक भारी सन्नाटा पसर गया। डॉक्टरों की टीम ने जैसे ही निरवैर के शरीर को देखा, उनके चेहरों की मायूसी ने सब कुछ बयां कर दिया। जिस निरवैर की किलकारियों से घर आंगन गूंजता था, वह हमेशा के लिए खामोश हो चुका था। 220 फुट गहरा वह बोरवेल मासूम के लिए काल का ग्रास बन गया।
**एक बड़ा सवाल:** निरवैर की इस दुखद मौत ने एक बार फिर हमारे सिस्टम और खुले छोड़े गए मौत के इन गड्ढों (बोरवेल) पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर मासूमों की बलि लेने का यह सिलसिला कब थमेगा?
प्रशासन ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया है, लेकिन इस हादसे ने पूरे इलाके को गहरे शोक में डुबो दिया है। हर आंख नम है और हर दिल इस दुख की घड़ी में पीड़ित परिवार के साथ है।

